आधी रात हो चुकी, आप एक घंटे पहले सोना चाहते थे, और फ़ीड भरती जाती है। अगली सुबह दिमाग़ भारी रहता है, जिससे फ़ोन और खींचता है। कई लोग यह चक्र पहचानते हैं, और विज्ञान इससे ज़्यादा सावधान है कि हर स्क्रीन समय बुरा है। सोशल मीडिया दोस्ती, रचनात्मकता और सहारा दे सकता है, और साइबरबुलिंग, परेशान करने वाली ख़बरें तथा तुलना भी, और असर इंसान, सामग्री, समय और नींद पर निर्भर करता है।
नींद से शुरू करना सबसे काम का है, क्योंकि असर दोनों तरफ़ चलता है: देर रात का इस्तेमाल नींद टालता है, और ख़राब नींद मन बिगाड़कर फ़ोन की ओर खींचती है। US सर्जन जनरल की सलाह युवाओं के लिए फ़ायदे और असली ख़तरे दोनों बताती है, इसलिए सबसे काम के सवाल व्यावहारिक हैं: क्या फ़ोन नींद टाल रहा है, क्या कोई फ़ीड चिंता बढ़ाती है, क्या ऑनलाइन झगड़ा घर तक पीछा करता है।
बच्चों और किशोरों के साथ यह और मुश्किल है, और खुली बातचीत अक्सर चुपके निगरानी से बेहतर होती है। WHO की किशोर मानसिक सेहत पर सलाह के अनुसार, पूछें कि बच्चा क्या देख रहा है, किससे बात कर सकता है, और कोई दबाव तो नहीं, और घर में ख़ुद सेहतमंद सीमाएं दिखाएं।
आप क्या कर सकते हैं
- फ़ोन बेडरूम से बाहर चार्ज करें और स्क्रॉल बंद करने का समय तय करें, क्योंकि देर रात की स्क्रीन नींद टालती है।
- बेवजह के नोटिफ़िकेशन बंद करें, परेशान करने वाले अकाउंट म्यूट करें, और काम के अकाउंट फ़ॉलो करें।
- एक छोटी सीमा चुनें, जैसे खाने के समय फ़ोन नहीं या हफ़्ते में एक शाम बिना स्क्रीन, और कुछ हफ़्ते निभाएं।
- बच्चों से खुलकर पूछें कि वे क्या देख रहे हैं, और ख़ुद वही सीमाएं दिखाएं।
- असर एक बुरी शाम नहीं, कई हफ़्तों में देखें।
ज़रूरी बात: लगातार उदासी, घबराहट या निराशा में मानसिक सेहत पेशेवर चाहिए। भारत में Tele-MANAS मुफ़्त, 24x7 उपलब्ध है, नंबर 14416, और ख़ुद को नुकसान के ख़याल में तुरंत मदद लें।