हर परिवार में एक मशहूर खर्राटे वाला होता है। कभी-कभी इस मज़ाक के पीछे असली बीमारी छिपी होती है, और उसका पता खर्राटे से नहीं, बीच-बीच की ख़ामोशियों से चलता है, जब सांस रुकती है, फिर हांफ के लौटती है।
इसमें सोते समय सांस की ऊपरी नली बार-बार सिकुड़ या बंद हो जाती है, और शरीर थोड़ा जागकर सांस दोबारा शुरू करता है, अक्सर बिना पता चले। नींद टुकड़ों में बंटती है और ऑक्सीजन नीचे-ऊपर होती रहती है, इसलिए आठ घंटे बिस्तर पर रहकर भी थकान रहती है।
सबसे साफ़ संकेत अक्सर साथ सोने वाला देखता है, जैसे तेज़ खर्राटे, सांस रुकना, नींद में हांफना, सूखे मुंह या सिरदर्द के साथ जागना, दिन में बहुत नींद, ध्यान न लगना और चिड़चिड़ापन। यह सिर्फ़ अधेड़ पुरुषों की बीमारी नहीं, महिलाओं और बच्चों में भी होती है।
नहीं। किसी ऐप, स्मार्टवॉच स्कोर या खर्राटे की रिकॉर्डिंग से इसकी पहचान नहीं हो सकती, और American Academy of Sleep Medicine सही डॉक्टरी जांच की सलाह देता है। डॉक्टर रात भर की स्लीप स्टडी या कुछ लोगों के लिए घर का टेस्ट करा सकते हैं।
इलाज कारण और गंभीरता पर निर्भर है, जैसे वज़न संभालना, सोने की मुद्रा, दांतों का उपकरण, या CPAP मशीन जो हवा के हल्के दबाव से नली खुली रखती है। दुकान के खर्राटे रोकने वाले गैजेट जांच की जगह नहीं लेते, और WHO बिना इलाज वाली नींद-सांस की दिक्कत के बड़े बोझ पर ज़ोर देता है।
अगर गाड़ी चलाते, मशीन पर या बच्चे को संभालते नींद रोकना मुश्किल हो तो जल्दी मदद लें, क्योंकि ऐसी नींद ख़तरा है। तेज़ खर्राटे, मुंह से सांस या ध्यान की दिक्कत वाले बच्चे को बच्चों के डॉक्टर को दिखाएं।